[दीवान]रूसी क्रांति के 90 साल : समाजवाद का सपना ज़िंदा है

reyaz-ul-haque beingred at gmail.com
Wed Nov 7 01:55:24 IST 2007


 रूसी क्रांति के 90 साल : समाजवाद का सपना ज़िंदा
है<http://hashiya.blogspot.com/2007/11/90.html>
<http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/5/54/Stormningen_av_vinterpalatset.jpg>वह
दुनिया की पहली क्रांति थी जो पहले से तारीख तय करके हुई थी.
लेनिन<http://www.marxists.org/archive/lenin/bio/index.htm>ने कहा था-6
नवंबर वक्त से पहले होगा... और 8 नवंबर तक वक्त बीत चुका होगा.
हमें 7 नवंबर को कार्रवाई शुरू करनी होगी. और क्रांति 7
<http://en.wikipedia.org/wiki/October_Revolution>को शुरू हुई.
विचारधाराओं और इतिहास के अंत की दंभपूर्ण घोषणाओं के दौर में रूस की संगठित
सर्वहारा क्रांति ने 90 वर्ष पूरे किये. यह वह दौर है जब 'द इकोनॉमिस्ट' में
लंबे-लंबे लेख इन प्रस्थापनाओं के साथ प्रकाशित हो रहे हैं कि एक विचार के बतौर
समाजवाद सबसे उन्नत है, लेकिन इसका कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं है. यहां तक दावे
किये जा रहे हैं कि लेनिन का प्रयोग मार्क्सवाद से एक भटकाव था.
अब रूसी क्रांति के 90 सालों के बाद भी, जब उस क्रांति द्वारा स्थापित हुआ
सोवियत संघ भी अब अस्तित्व में न हो, इकोनॉमिस्ट का यह कहना यह दिखाता है कि
मार्क्सवाद का भय किस कदर बना हुआ है.
20 वीं सदी की शुरुआत, 19वीं सदी के अंत की तरह सर्वहारा के संघर्ष से हुई,
जिसके साथ मार्क्सवाद का क्रांतिकारी वैचारिक आधार था और जिसे अंतरराष्ट्रीय
तौर पर लेनिन जैसे नेता का नेतृत्व हासिल था. लेनिन ने पूंजीवाद के स्थायी रूप
से संकटग्रस्त होने की बात करते हुए कहा कि पूंजीवाद का अल्पकालिक संकट अब एक
निरंतर संकट के दौर में प्रवेश कर गया है, जो अंतत: पूंजीवाद के अंत पर जाकर
समाप्त होगा. इसे उन्होंने पूंजीवाद की उच्च्तम अवस्था कहा, जहां से आगे जाना
संभव नहीं है, बस उसका अवसान और अंत ही संभव है.
हालांकि लेनिन की क्रांति संबंधी कार्यनीतियों को अनेक कम्युनिस्ट नेताओं ने ही
चुनौती दी, मगर अंतत: लेनिन सही साबित हुए. उनके नेतृत्व में सर्वहारा ने
क्रांति की.
एक ऐसे समय में जब दुनिया के साम्राज्यवादी देश दुनिया पर कब्जे के लिए युद्ध
कर रहे थे और मुनाफे के लिए मारामारी के बीच जनता भयानक और त्रासद गरीबी में जी
रही थी, क्रांति ने दुनिया की एक बड़ी आबादी को मुनाफाखोरों के कब्जे से निकाल
लिया. हालांकि दो ही दशकों के भीतर दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और इसमें सोवियत
जनता को काफी जान-माल की क्षति उठानी पड़ी. लेकिन इसी के साथ यह उपलब्धि भी
सोवियत जनता की ही थी कि उसने फासीवाद से दुनिया को बचाया.
मगर जल्दी ही, स्टालिन के बाद के सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी पर
स्टालिनविरोधी ताकतों का कब्जा हो गया. काउत्स्कीपंथी और स्टालिनविरोधी ताकतें
हावी हुईं. उनकी कारगुजारियों ने अंतत: सोवियत संघ का विघटन करके छोड़ा. यह
विघटन उनके पूंजीवाद का पतन था न कि लेनिन और मार्क्स की विचारधारा का.
माओ-त्से-तुंग ने लेनिन की विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए चीन में सांस्कृतिक
क्रांति की और उसे और अद्यतित किया. मगर माओ के बाद के चीन में भी ऐसी शक्तियां
हावी हुईं, जिन्होंने चीन को बाजार के आगे दंडवत कर दिया है.
तो क्या इससे यह साबित होता है कि अब समाजवाद की उम्मीद खत्म हो गयी? वह विफल
हो गया? दरअसल इन घटनाओं से सिर्फ यह साबित होता है कि समाजवाद को जैसे ही
मेहनतकश जनता से अलग किया जायेगा, वह खत्म हो जायेगा. इन दोनों असफलताओं ने
मार्क्स और लेनिन को और ज्यादा सही साबित किया है.
और आज के दौर में, जब एफडीआइ-एफआइआइ के रूप में पूंजी का आयात-निर्यात अपने
सबसे विकराल रूप में हमारे सामने है, एमएनसी-टीएनसी पूरे व्यापार का नियंत्रण
कर रहे हैं और साम्राज्यवाद अपने संकट से निकलने के लिए एक के बाद एक देश पर
युद्ध थोपता जा रहा है-लेनिन और मार्क्स उतने ही अवश्यंभावी लग रहे हैं. जिस
महामंदी से पूंजीवाद को कीन्स ने निकाला था, 70 के दशक से वह फिर हावी हो गया
है. यह इसलिए अधिक खतरनाक है, क्योंकि इससे निबटने के सारे कीन्सीय औजार विफल
हो गये हैं.
और ठीक इसी समय दुनिया के अनेक देशों में जनता का प्रतिरोध तेज हो रहा है. पूरा
एशिया और लैटिन अमेरिका जनता के विद्रोहों के केंद्र बनते जा रहे हैं. पूंजी का
इतना असमान वितरण हुआ है कि मात्र एक प्रतिशत लोग दुनिया की आधी से अधिक
संपत्ति के स्वामी हैं.
और ऐसे में समाजवाद का सपना जिंदा है, क्योंकि उसे अभी संसाधनों का, आमदनी का,
अवसरों का और सामाजिक न्याय का समाज में समान बंटवारा करना है-उन सबका जिन्हें
आज तक की कथित उदारवादी आर्थिक नीतियां करने में विफल रही हैं. उसे उत्पादन को
इस तरह समायोजित करना है कि पूरे समुदाय की जरूरतों को पूरा करे, न कि मुनाफे
का माध्यम बने.
सोवियत संघ खत्म हो गया, मगर इससे क्रांति समाप्त नहीं हुई. चिड़िया घोंसला
बनाती है और आंधियां उसे उड़ा ले जाती हैं. मगर इससे चिड़िया के लिए घोंसले की
उपयोगिता-अनिवार्यता खत्म नहीं हो जाती. उसे बार-बार घोंसला बनाना पड़ता है.
बस, इससे वह यह सीखती है कि उसे और बेहतर घोंसला बनाना है. इसलिए यह इतिहास के
अंत का नहीं, जनता द्वारा स्वर्णिम इतिहास के निर्माण का दौर है.

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REYAZ-UL-HAQUE______________________________
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Ph - 0612234881
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