[दीवान]युद्धदेव के राज में गुंडों का नंदीग्राम- प्रभाष जोशी
Neelima Chauhan
neelimasayshi at gmail.com
Fri Nov 16 14:43:48 IST 2007
युद्धदेव के राज में गुंडों का
नंदीग्राम<http://mohalla.blogspot.com/2007/11/blog-post_15.html>
*प्रभाष जोशी* <http://mohalla.blogspot.com/2007/05/blog-post_20.html>
<http://bp2.blogger.com/_Zl-3hmYZQL8/Rzvm7i3jJrI/AAAAAAAABMY/8_8OAQFlyyo/s1600-h/rajendra-cartoon-buddha.JPG>
...और ये बुद्धदेव भट्टाचार्जी हैं - लेखक, विचारक, बांग्ला भद्रलोक के
सुसंस्कृत प्रतिनिधि, संवेदनशील प्रशासक और आपके मेरे और अपने लोकतंत्र के
दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री। नंदीग्राम के तीस गांवों पर जब
माकपा के हथियारों से लैस काडर ने कब्जा कर लिया तो कोलकाता की राइटर्स
बिल्डिंग में इनने गर्व से कहा - "विपक्ष और भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति को
ईंट का जवाब पत्थर से दे दिया गया है... ग्यारह महीनों से अपने घर आंगन से
दूर रह रहे हमारे समर्थक लौटने को बेताब थे। वे अपनी जान पर खेल कर घर वापस आ
गये। हताशा में उन्हें जवाब देना पड़ा। उनका ऐसा करना नैतिक और क़ानूनी दोनों
ही तरीक़ों से उचित था।"
"भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति ग्यारह महीनों से नंदीग्राम पर राज कर रही थी।
उनने हमारे काडर को घरों से उखाड़ कर खदेड़ा और अत्याचार कर के सताया। वहां
पुलिस जा नहीं सकती थी, क्योंकि मैं 14 मार्च को दुहराना नहीं चाहता था। (जब
पुलिस की गोलियों से 14 लोग मारे गये थे) अब बड़े लोग विरोध में उठ खड़े हुए
हैं। लेकिन तब कोई नहीं बोल रहा था, जब हमारे लोग मारे जा रहे थे। हमारे काडर
को इस तरह ज़बरदस्ती घुसना नहीं पड़ता और यह ख़ून ख़राबा भी नहीं होता अगर
केंद्र से केंद्रीय सुरक्षित बल समय पर नहीं पहुंच जाता। मैंने 27 अक्टूबर को
ही केंद्र से विनती की थी। वहां से पांच नवंबर को कहा गया कि हम नहीं भेज सकते।
मैंने गृहमंत्री शिवराज पाटील और विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी को फिर कहा। दस
नवंबर को हमें कहा गया कि 12 नवंबर को सीआरपीएफ आएगा। केंद्र ने अगर तत्काल
कार्रवाई की होती तो काडर के ख़ून ख़राबे को रोका जा सकता था।" यानी
ज़िम्मेदारी केंद्र की है।
आपने इन बुद्धदेब भट्टाचार्जी के सफेद झक बाल और विचारशील आंखों पर काला चश्मा
देखा होगा। आपको शक तक नहीं हुआ होगा कि अपने लोगों की तरफ से ख़ून का बदला
ख़ून करने में ये नरेंद्र मोदी को भी मात देंगे। गोधरा में कारसेवकों से भरी
रेल की बोगी जलने के बाद नरेंद्र मोदी वहां पहुंचे थे और उनने कहा था कि क्रिया
की उतनी ही ज़बर्दस्त प्रतिक्रिया होती है। उनने तीन दिन तक अपने संघ
परिवारियों को गुजरात के मुसलमानों से बदला लेने की छूट दे दी थी। आप जानते ही
हैं और *तहलका* <http://www.tehelkahindi.com/gujrat> के खुफिया कैमरे के सामने
उन सबने बताया ही है नरेंद्र भाई के छूट देने के बाद मुसलमानों से कैसे बदला
लिया गया। लेकिन अपने हिंदुत्ववादी शौर्य के बावजूद नरेंद्र मोदी ने कभी दावा
नहीं किया कि गोधरा का बदला लेना नैतिक और क़ानूनी रूप से उचित था। यह बेशर्मी
और उद्दंडता एक माकपाई मुख्यमंत्री को ही शोभा दे रही है कि उनके राज में
उन्हीं की पार्टी के काडर ने उन्हीं के एक ग्राम समूह नंदीग्राम को युद्ध
क्षेत्र बना कर उस पर फिर से कब्ज़ा किया। और एक लेखक, विचारक और लोकतांत्रिक
तरीके से निर्वाचित मुख्यमंत्री कह रहा है कि "हमारे लोगों" ने ठीक किया।
यह बुद्धदेव भट्टाचार्जी पूरे पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री है या माकपाई काडर
का? और पश्चिम बंगाल एक लोकतांत्रिक गणराज्य का लोकतांत्रिक प्रदेश है या
मध्ययुगीन सावंत की हथियारबंद लुटेरी सेना की रियासत? मई में नंदीग्राम के
गोकुलनगर में हमने एक जवान से पूछा था - सेज़ तो नहीं बनेगा। अब आप प्रतिरोध
छोड़ते क्यों नहीं? उसने कहा था - अपने ही लोगों से लड़ने वाले इस बुद्धदेव को
आप नहीं जानते। यह लौट के आएगा और युद्ध करेगा। देख लेना। अब सारे देश ने देख
लिया है कि युद्धदेव यात्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी आठ महीने बाद किस तरह लौट के
आया और उसके काडर ने किस तरह युद्ध करके नंदीग्राम को भूमि उच्छेद प्रतिरोध
समिति और माओवादियों के चंगुल से छुड़ाया। आठ महीने पहले यानी 14 मार्च को
पुलिसवालों के साथ हथियारबंद काडर के लोग थे। उन्हें लोगों ने इसलिए पहचान
लिया कि वे पुलिस के जूते नहीं सैंडिल पहने हुए थे। लोगों को मालूम था कि वे
किस तरह से आएंगे। इसलिए तेखाली पुल, गोकुलनगर, अधिकारीपाड़ा और दूसरी तरफ
भंगाबेड़ा पुल से सोनाचुड़ा के पास उनने पूजा और नमाज पढ़ना एक साथ आयोजित किया
था। वे मानते थे कि औरतों और बच्चों पर पुलिस और काडर गोली नहीं चलाएंगे।
लेकिन उनने जो किया, हमलावर विदेशी सेना भी नहीं करती। बिना चेतावनी के गोली
चलायी, लाठी चलायी और औरतों से बलात्कार ही नहीं किया, उनसे ऐसा बदला लिया कि
लिखने में भी शर्म आ जाए। 14 लोग मारे गये। कई घायल हुए।
दो महीने बाद हमें सोनाचुड़ा में एक औरत मिली, जिसने पलक झपकाये बिना बताया -
"उनके लिए बलात्कार ही काफी नहीं था। उनने एक गोली मारी योनि में घुसेड़ दी।"
दूसरी औरत ने गोकुलनगर में कहा - "बलात्कार के बाद उनने एक सरिया मेरी योनि
में घुसेड़ा और देर तक घुमाते रहे। मैं आज भी ठीक से पेशाब नहीं कर सकती।"
नंदीग्राम से लौट कर एक टीवी कार्यक्रम के दौरान मैंने गोपालन भवन की एक
सुकन्या सुभाषिनी अली से कहा - "आप और वृंदा (करात) इन औरतों से मिलने क्यों
नहीं जाती?" उनने कहा - "हम वहां जा नहीं सकते। वहां तृणमूल का राज है।"
नंदीग्राम में कोई 39 गवाहों ने मुंह जबानी और 135 पीड़ितों ने लिख के दिया
था। गोकुलनगर और सोनाचुड़ा की सुनवाइयों से लौट कर हम कोलकाता आये थे, जहां
विश्वविद्यालय के लाइब्रेरी हॉल में 20 लोगों ने गवाही दी थी। सब कुछ देख सुन
कर हमें लगा था कि यह मामला सिर्फ सेज़ के लिए अपनी ज़मीन न देने नहीं है। कभी
नंदीग्राम माकपा का गढ़ था। लेकिन सलीम ग्रुप के केमिकल सेज़ के लिए वहां के
छोटे किसानों ने ज़मीन देने से इनकार किया। उन्हें तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस
सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर आदि विपक्षी संगठनों ने गोलबंद किया और छह जनवरी 2007
को भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति बनायी। दो महीने तक नंदीग्राम के किसान मज़दूर
इस समिति के झंडे तले संघर्ष करते रहे। सेज़ के पैरोकार माकपाई काडर से उनकी
झड़पें होती रहीं। ख़ून ख़राबा भी हुआ। तब पुलिस और काडर ने लोगों को माकपा
छोड़ने और उसके औद्योगीकरण के कार्यक्रम का विरोध करने की सज़ा देने का निश्चय
किया। 14 मार्च को यही बदला लिया गया। प्रतिशोध की आंच आश्चर्यजनक थी।
सात जनवरी को मारे गये *विश्वजीत मैती* के रिक्शा चालक पिता ने कहा - "मेरे
दादा कम्युनिस्ट थे। तेभागा में उनने भाग लिया था। मेरे पिता हमेशा
कम्युनिस्ट रहे। मैं माकपा का काडर था और मेरे ही चौदह बरस के बेटे को उनने
मार दिया। माकपा छोड़ने की सज़ा ही नंदीग्राम है। इसका औद्योगीकरण से अपनी
ज़मीन बचाने से क्या लेना देना है।" नंदीग्राम राजनीतिक प्रतिशोध है।
इसलिए तो आठ महीने बाद पूरी तैयारी के साथ माकपा के हथियारबंद काडर ने अपनी
राजनीतिक भूमि पर फिर कब्ज़ा करने के लिए हमला किया। इस बार सावधानी बरती गयी
कि राज्य की पुलिस को साथ न लिया जाए। बल्कि जहां-जहां 14 मार्च के बाद पुलिस
चौकियां बनायी गयी थीं, वहां से पुलिस हटा ली गयी। पुराने थानों में जो पुलिस
वाले थे, उनसे कहा गया कि कोई कार्रवाई करने की ज़रूरत नहीं है। सात नवंबर तक
नंदीग्राम की सीमा पर खेजुरी में ही माकपाई काडर का कब्ज़ा था। जनवरी से यहीं
से माकपाई काडर बम फेंकने और रात रात भर गोली चलाने में लगा रहता था। मई में जब
हम सोनाचुड़ा और गोकुलनगर गये थे, तो सभी लोग खेजुरी से होने वाली गोलीबारी और
बमबारी की बात करते थे। हमें कहा गया था कि रात भर यहां रह कर देखिए। इसी
खेजुरी में उन लोगों का कैम्प भी था, जो माकपाई काडर होने के कारण अपने घर से
भाग या भगा दिया गया था।
सात नवंबर को माकपाई काडर ने हथियारबंद कार्रवाई शुरू की। घर जलाये गये। समिति
के समर्थकों पर बंदूकों और बमों से हमले किये गये। काडर काफी संख्या में थे और
उनके पास गोला बारूद भी काफी था। लोग अपने गांवों को छोड़ कर भागे। उन पर भी
गोलियां चलायी गयीं। दस नवंबर को उजड़े-उखड़े कोई दस हज़ार लोगों ने विरोध में
जुलूस निकाला, जिस पर काडर ने हमला किया। काडर ने मीडिया और सामाजिक
कार्यकर्ताओं के लिए नंदीग्राम को सील कर दिया था। इसलिए सरकार का कहा ही मानना
पड़ेगा कि चार लोग मारे गये, ग्यारह घायल हुए और एक औरत के साथ बलात्कार हुआ।
दूसरे लोगों का दावा है कि कम से कम 40 लोग मारे गये। 12 नवंबर को सरकार ने
सीआरपीएफ के जवानों को तभी जाने दिया, जब नंदीग्राम पर माकपाई काडर का पूरा
कब्ज़ा हो गया था। नंदीग्राम में एक जगह काडर ने सीआरपीएफ को भी रोके रखा।
राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी ने मार्च की तरह ही बयान दिया। जो कुछ हुआ है यानी
जिस तरह नंदीग्राम पर कब्ज़ा किया गया है, वह एकदम ग़ैरक़ानूनी है और मंज़ूर
नहीं किया जा सकता। कोई भी सरकार या समाज किसी युद्धक्षेत्र को बना नहीं रहने
दे सकता। उसे तत्काल प्रभावकारी कार्रवाई करनी चाहिए। नंदीग्राम में सरकार ने
कुछ नहीं किया। अपने काडर को करने के लिए छोड़ दिया। इससे वाम मोर्चे में फूट
पड़ी। फारवर्ड ब्लॉक, भाकपा और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ने अपने को
नंदीग्राम की हिंसा से अलग किया और माकपा को ज़िम्मेदार ठहराया। ममता बेनर्जी
और दूसरी पार्टियों ने बंद करवाया जो सफल रहा। दिल्ली में प्रकाश करात ने
नंदीग्राम की हिंसा को उचित ठहराया। कहा कि तृणमूल और माओवादी मिल कर माकपा के
लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये पंचों, विधायकों और सांसदों को हिंसक तरीक़े से
काम करने से रोके हुए थे। हमारे 1500 कार्यकर्ता खदेड़ दिये गये थे। वे अब वापस
नंदीग्राम लौट आये हैं।
कोलकाता हाईकोर्ट में सरकार की तरफ से कहा गया कि ग्यारह महीने से माकपा के
1500 कार्यकर्ता अपने घरों से बाहर खदेड़ दिये गये थे। उन्हें हथियारबंद लोग
वापस अपने घरों में ले आये हैं। इस पर न्यायालय ने पूछा कि सरकार ने उन्हें
उखड़ने क्यों दिया और पुलिस उन्हें क्यों नहीं वापस ला सकती थी? पश्चिम
बंगाल में संवैधानिक सरकार है कि नहीं? लोगों और मीडिया के नंदीग्राम में
आने-जाने की स्वतंत्रता बहाल होनी चाहिए। लेकिन जिन पांच दिनों में कार्रवाई
हुई, काडर ने न मेधा पाटकर को जाने दिया, न ममता बेनर्जी को। इस पर पश्चिम
बंगाल के बुद्धिजीवियों, कलाकारों, फ़िल्मकारों और लेखकों ने विरोध प्रदर्शन
किया, जिस पर पुलिस ने लाठी चलायी। लालकृष्ण आडवाणी ने नंदीग्राम पहुंच कर
हालत देखी और उसे अपने राजनीतिक जीवन का सबसे दुखदायी दृश्य बताया। राज्यपाल
से कहा कि वे वामपंथी सरकार को डिसमिस करने की सिफारिश करें।
लेकिन अपने लोकतंत्र का यक्ष प्रश्न है कि सन 92 में अयोध्या में कल्याण
सिंह ने बाबरी मस्जिद संघ परिवार के कारसेवकों के हवाले कर दी थी। फिर 2002 में
गोधरा का बदला लेने के लिए नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुसलमानों को संघ
परिवारियों की मेहरबानी पर छोड़ दिया। और अब बुद्धदेव भट्टाचार्जी ने नंदीग्राम
पर वापस कब्ज़ा करने की छूट माकपाई काडर को दे दी। काडर आधारित पार्टियों के
इन तीनों मुख्यमंत्रियों ने अपना संवैधानिक, लोकतांत्रिक और प्रशासनिक
कर्तव्य निभाने के बजाय अपनी पार्टियों के काडर को मनमानी कार्रवाई करने की न
सिर्फ छूट दी, अपनी सत्ता का इस्तेमाल प्रशासनिक ढांचे को निष्काम करने में
किया। कल्याण सिंह की सरकार तो डिसमिस हुई। नरेंद्र मोदी और बुद्धदेव
भट्टाचार्जी अपनी पार्टियों से रक्षित और प्रशंसित हैं। ये अपने देश में
लोकतंत्र को ख़त्म कर देंगे। ये नरेंद्र मोदी और बुद्धदेव भट्टाचार्जी।
आभार-जनसत्ता*, 15 नवंबर 2007, गुरुवार*
*मोहल्ला*
--
Neelima
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