[दीवान]नंदीग्राम ने हथियार नहीं डाले हैं
reyaz-ul-haque
beingred at gmail.com
Sun Nov 25 21:51:02 IST 2007
नंदीग्राम ने हथियार नहीं डाले
हैं<http://hashiya.blogspot.com/2007/11/blog-post_25.html>
*सुष्मिता को हम पहले भी
पढ़<http://hashiya.blogspot.com/2007/05/blog-post_14.html>चुके हैं, जब
उन्होंने बंगाल की सीपीएम सरकार के चौन्धियानेवाले आंकडों के झूठ
को उजागर करते हुए हमें बताया था की असलियत क्या है. इस बार वे फिर कुछ नए
तथ्यों और नंदीग्राम के लोगों के प्रति संवेदना के साथ अपनी टिप्पणी लिए
प्रस्तुत हैं.
सुष्मिता
*आपने बुद्धदेव के चेहरे की चमक देखी होगी, जब वे घोषणा कर रहे थे कि नंदीग्राम
के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है. यह चमक ठीक वैसी ही
मालूमपडती थी, जैसे इराक और अफगानिस्तान पर कब्जे की घोषणा करते हुए जॉर्ज बुश
के चेहरे की चमक. फर्क केवल इतना ही था कि बुद्धदेव के चेहरे पर अपने ही राज्य
के लोगों की हत्या की चमक थी और जॉर्ज बुश दूसरे देशों के लोगों की हत्याओं पर
मुस्कुरा रहे थे. यदि आपको लगे कि २००२ में नरेंद्र मोदी भी शायद कुछ इसी तरह
मुस्कुरा रहे थे, जब वह गुजरात में नरसंहारों को जायज ठहराने के लिए क्रिया के
विपरीत प्रतिक्रिया के सिद्धांत को याद कर रहे थे तो इसमें आपकी गलती नहीं है.
चेहरे एक-दूसरे में घुल-मिल से गये हैं.
अंततः नंदीग्राम को फतह कर लिया गया. एक भयानक नरसंहार...जिसने सैकडों लोगों की
जान ली, दूसरे सैकडों अब भी लापता हैं, दर्जनों महिलाओं का सीपीए के झंडे तले
बलात्कार हुआ और अनेक मकान जला दिये गये.
गांववालों का कहना है कि दूसरे दौर की हिंसा में करीब 150 लोगों को मार दिया
गया है. लगभग 2000 लोग अब भी गायब हैं. घटना के दिन करीब 550 लोगों को रस्सी से
बांध कर खेजुरी ले जाया गया जहां इनको सीपीए ने ढाल के रूप में इस्तेमाल किया,
ताकि नंदीग्राम के लोग जवाबी कार्रवाई न कर सकें. तमाम स्रोतों का कहना है कि
इस हत्या अभियान में पेशेवर अपराधियों एवं डकैतों का सहारा लिया गया था.
नंदीग्राम को फतह कर लेने की जिम्मेवारी जिस माकपाई गुंडावाहिनी को दी गयी थी,
उसका नेतृत्व उसके चार सांसद कर रहे थे और उसमें शामिल थे तपन घोष एवं शकुर अली
जैसे कुख्यात अपराधी. ये दोनों 2001 में छोटा अंगरिया हत्याकांड में सीबीआइ
द्वारा घोषित फरार अपराधी हैं.
हमने सुना कि नंदीग्राम के लोगों ने अपनी करतूतों की पाई-पाई चुका दी है.
हमने सुना कि महिलाओं द्वारा मेधा पाटकर को अपना पिछवाडा दिखाना समाजवाद लाने
के कार्यभारों में से है.
हमने यह भी सुना कि नंदीग्राम की महिलाओं की देह में सीपीएम के लाल झंडे गाड
दिये गये.
हमने सुना और शर्मसार हुए. हमने उजाले की संभावनाओं को अंधेरे के सौदागरों के
हाथों बेच देनेवालों के बारे में सुना. हमने उस मुख्यमंत्री के बारे में सुना
जो 150 लोगों के कत्ल के बाद सुगंधित पानी से हाथ धोकर फिल्मोत्सव की तैयारियों
में जुट गया.
नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है...और फिजा में विजय के उन्माद से भरे नारों और
गीतों का जश्न है. सहमा...वीरान...राख...राख नंदीग्राम! वह नंदीग्राम जो हमारी
उम्मीदों का सबसे ताजा मरकज है.
वह नंदीग्राम जो पेरिस कम्यून से लेकर रूस, चीन, वियतनाम और नक्सलबाडी सहित
अनेक महान शहादतों में सबसे गर्म खून है.
नंदीग्राम को फतह करने की पृष्ठभूमि लगभग एक साल से बनायी जा रही थी. सिंगूर के
सेज से सबक लेकर नंदीग्राम के लोग पहले से ही सचेत थे. जुलाई, 2006 से ही
नंदीग्राम में केमिकल हब के लिए 28, 000 एकड जमीन के अधिग्रहण की बात हवा में
थी. नंदीग्राम के लोगों ने अपनी जमीन बचाने की लडाई शुरू कर दी. पिछले मार्च
में भी सीपीएम ने नंदीग्राम पर कब्जा जमाने का भरसक प्रयास किया. लेकिन वे सफल
नहीं हो सके.
दरअसल यह सीपीएम के लिए प्रतिष्ठा का सवाल था. वह नंदीग्राम की जनता की चुनौती
बरदाश्त नहीं कर सकती थी, इसलिए इस बार सीपीएम ने काफी साजिशपूर्ण तरीके से
अपना हमला संगठित किया. सबसे पहले भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के लोगों के साथ
समझौता कराया गया एवं उसके बाद फिर उन पर हमला किया गया, ताकि वे प्रतिरोध के
लिए तैयार नहीं रह सकें. कहा जा रहा है कि इस हमले की तैयारी कई महीनों से
खेजुरी में चल रही थी. इसके लिए रानीगंज, आसनसोल, कोलबेल्ट, गरबेटा एवं केशपुर
से गुंडों को भाडे पर लाया गया. इस पूरे अभियान का संचालन सीपीएम के उच्च
नेतृत्व के हाथ में था. यह पूरी तरह गुप्त तरीके से चलाया जा रहा था.
हत्या अभियान के दिन सीपीएम के लक्ष्मण सेठ कह रहे थे-'मारो, न मरो.' विनय
कोनार महिलाओं का आह्वान कर रहे थे कि वे 'अपनी साडी उठायें और मेधा पाटकर को
अपना पिछवाडा दिखायें.' विमान बोस लगातार देश को बता रहे थे-'नंदीग्राम के लोग
हमें रसगुल्ला नहीं खिला रहे थे.'
इन्हीं हत्यारे नारों के बीच कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में ठहाके गूंज रहे
थे और यहां के निवासी आश्वस्ति और उल्लास में एक दूसरे को बधाइयां देते हुए हाथ
मिला रहे थे-'नंदीग्राम के लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे दिया गया है.'
सीआरपीएफ की तैनाती भी साजिशपूर्ण तरीके से की गयी. पहले नंदीग्राम पर बर्बर
हमला किया गया और उसके बाद सीआरपीएफ को पश्चिम बंगाल की जनता के तमाम विरोधों
के बाद तैनात किया गया ताकि वहां की जनता को प्रतिरोध करने से रोका जा सके एवं
नंदीग्राम पर पूरी तरह उनका नियंत्रण बना रहे. इस पूरी प्रक्रिया में केंद्र और
राज्य दोनों की सरकारों के बीच निर्लज्जा सौदेबाजी हुई. केंद्र सरकार का कोई भी
मुख्य अधिकारी नंदीग्राम में नहीं गया. उसने सीआरपीएफ की कंपनी दी और इसके एवज
के बतौर वामफ्रंट ने न्यूक्लियर डील पर आइएइए से बात करने की हरी झंडी दी.
साम्राज्यवाद की चमचागीरी का यह एक और नमूना है.
अब नंदीग्राम में शांति है. एक मरी हुई शांति, जो श्मशान में होती है. बस
जल्लाद चीख रहा है. जल्लाद नंदीग्राम के लोगों को तहजीब बता रहा है. वह पूरे
देश की जनता को लोकतंत्र के मायने समझा रहा है. वृंदा करात और प्रकाश करात
मारो-मारो की हत्यारी पुकारों के बीच निर्लज्जातापूर्वक हमें लोकतंत्र की तहजीब
के बारे में बता रहे हैं. हमें कहा जा रहा है कि चूंकि वहां बहुमत की सरकार
द्वारा यह कदम उठाया गया है इसलिए नंदीग्राम का हत्या अभियान जायज है. हमें कहा
जा रहा है कि नंदीग्राम पर सवाल उठानेवाले लोग एक चुनी हुई सरकार के खिलाफ
साजिश कर रहे हैं. 2002 में नरेंद्र मोदी की भाषा यही थी या नहीं, क्या हमें यह
याद करने की इजाजत है 'कॉमरेडों'? क्या जॉर्ज बुश की भाषा इससे अलग होती है जब
वह इसी लोकतंत्र का हवाला देकर दुनिया के कमजोर एवं प्रतिरोध करनेवाले देशों पर
हमला करता हैङ्क्ष सीपीआइ के डी राजा एवं सीपीएम के प्रकाश करात कह रहे हैं कि
चुनी हुई सरकार को नंदीग्राम में कोई काम नहीं करने दिया जा रहा था. मतलब कि
इनके लोकतंत्र को नंदीग्राम के लोगों से खतरा था. तो क्या अब लोकतंत्र केवल
सत्ता द्वारा जनता की हत्याओं को जायज ठहराने का औजार भर रह गया है? क्या सत्ता
को आम जनता को उसके घरों से खदेडने एवं हत्या करने का अधिकार केवल इसलिए मिल
गया है कि तथाकथित रूप से वह चुनी हुई हैङ्क्ष यदि इस लोकतंत्र को नंदीग्राम के
लोगों से खतरा है तो नंदीग्राम के लोगों को भी यह कहने का अधिकार क्यों नहीं
होना चाहिए कि यदि यह लोकतंत्र हमारे जीने के अधिकारों पर पाबंदी लगाता है तो
उन्हें भी इस लोकतंत्र से खतरा हैङ्क्ष सच तो यह है कि नंदीग्राम की जनता तो
अपने जीने के अधिकारों के लिए ही लड रही है, जो अंतिम रूप से अपनी मातृभूमि की
रक्षा की भी लडाई है.
लेकिन इस हत्या एवं उत्पीडन का गवाह अकेले नंदीग्राम नहीं है. साम्राज्यवादी
ताकतों ने पूरी दुनिया में नंदीग्राम की तरह ही अभियान चलाया. पूरे लैटिन
अमेरिका एवं वियतनाम में साम्राज्यवादी लूट को चलाने के लिए वहां के स्थानीय
आदिवासियों को भयानक हत्या के जरिये उनकी वास्तविक जगहों से भगा दिया गया.
कहीं-कहीं उनकी पूरी प्रजाति को ही नष्ट कर दिया गया.
भारत में भी साम्राज्यवाद के चमचे उनकी ही रणनीति अपना रहे हैं. वर्षों पहले
केरल मे मुथंगा में सत्ता ने ऐसा ही नरसंहार रचा था. मुथंगा में भी आदिवासियों
ने बहादुरी से प्रतिरोध किया. लेकिन अंततः सत्ता के योजनाबद्ध एवं खूनी हमले
में उनको कुचल दिया गया. ठीक ऐसी ही प्रक्रिया छत्तीसगढ में अपनायी गयी.
आदिवासियों में पहले फूट डाली गयी एवं एक हिस्से को अपने पक्ष में करके उन्हें
उनकी जगह से हटा कर कैेंपों में लाया गया. जबकि दूसरे हिस्से पर भयानक हमला कर
उन्हें भी वहां नहीं रहने दिया गया. अब वहां राहत शिविरों को ही गांवों में बदल
देने की योजना है. इन सबको अपनी जमीन से उजाड दिया गया और उनकी जमीनें
बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही हैं. यही प्रक्रिया उडीसा, झारखंड एवं
पश्चिम बंगाल में भी चलाने की साजिशें जारी हैं. पहले निवासियों को उनकी जमीन
से हटाओ (चाहे जैसे भी हो), फिर उसे साम्राज्यवाद के कदमों में हस्तांतरित कर
दो.
नंदीग्राम की जनता के साथ भी यही किया गया है. प्रतिरोध करनेवाले लोगों को उनकी
जगहों से खदेड दिया गया है और कहा जा रहा है कि अब वे सीपीएम की मरजी पर ही
वहां लौट सकते हैं.
हमें लगता है कि हम अपनी जगह में बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से बैठे हैं. इसलिए
कि अशांति तो हमसे दूर कहीं मुथंगा, छत्तीसगढ या फिर नंदीग्राम में है.
लेकिन वह हरा सांप हमें अचानक रेंगता हुआ अपनी खाट के नीचे महसूस होता है. वह
हरी घासों में इस तरह छिपा होता है कि पता ही नहीं चलता कि वह है कहां. ऐसे में
हमारे पास अपनी खाट छोडने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता. वह सांप हरी घास
में छिपा हुआ रेंग रहा है. मुथंगा से छत्तीसगढ, कलिंग नगर, झारखंड, सिंगुर,
नंदीग्राम और न जाने कहां-कहां. सीपीआइ-सीपीएम के लोग उन तमाम लोगों को विकास
विरोधी बता रहे हैं, जो नंदीग्राम अभियान का विरोध कर रहे हैं.
लेकिन आंकडों पर गौर करें तो पता चलता है कि पहले से ही पश्चिम बंगाल में लगभग
55 हजार कारखाने बंद पडे हैं. बीमार उद्योगों की संख्या 1, 13, 846 है, जो पूरे
देश का 45.60 प्रतिशत है. पिछले 15 सालों में लगभग 15 लाख मजदूरों को उनके काम
से निकाल दिया गया, जबकि महज 43 हजार 888 लोगों को काम मिला. सरकारी एवं निजी
संगठित क्षेत्रों में 1980 में कुल 26 लाख, 64 हजार लोग कार्यरत थे. जब
औद्योगिकीकरण का मंत्र पढा जा रहा है, इस दौर में यह गिर कर 22 लाख 30 हजार पर
आ गया है. वहीं रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 1977 (जब वाम फ्रंट सत्ता में
आयी) के 22 लाख 27 हजार से बढ कर 2005 में 72 लाख 27 हजार 117 हो गयी है. यहां
यह जानना जरूरी है कि 35 साल से अधिक उम्र के लोग इसमें नहीं लिये जाते. कृषि
संकट ने और बुरे हालात पैदा किये हैं. सीपीएम के नेता भूमि सुधार की डींग
हांकते नहीं थकते. वे तर्क दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में कृषि ने उद्योग के
लिए आधार तैयार कर दिया है. लेकिन इनका ढोंग तब सामने आ जाता है जब पता चलता है
कि 1982 में विधानसभा चुनाव एवं 1983 में पंचायत चुनाव के बाद ऑपरेशन बर्गा या
बंजर जमीनों को जोतने लायक बनाने का काम भी रुक गया. यही नहीं 2004 की मानव
विकास रिपोर्ट बताती है कि राज्यों में 14.31 प्रतिशत बर्गादार अलग-अलग जगह
विस्थापित हो गये हैं. यह प्रतिशत जलपाईगुडी में 31.60, कूचबिहार में 30.2,
उत्तर दिनाजपुर में 31.42 एवं दक्षिण दिनाजपुर में 30.75 है. यही नहीं पट्टा
दिये गये लोगों का विस्थापन भी लगभग 13.23 है. 1992-2000 में 48.9 प्रतिशत
गांवों के परिवार भूमिहीन हो गये. जहां तक खाद्यान्न उत्पादन का सवाल है वह भी
पश्चिम बंगाल में कृषि की दयनीय स्थिति को स्पष्ट करता है. 1976 में प्रति
व्यक्ति प्रतिदिन पूरे देश में खाद्यान्न उपलब्धता 402 ग्राम के मुकाबले पश्चिम
बंगाल में 412 ग्राम था. यह 1999 में 502 ग्राम के मुकाबले 444 ग्राम हो गया.
2001 में यह आंकडा पश्चिम बंगाल में 413 ग्राम तक पहुंच गया. (स्रोत-अजीत
नारायण बसु, पश्चिम बंगाल की अर्थनीति एवं राजनीति) यह कृषि के भयानक संकट को
स्पष्ट करता है.
यदि विकास के सिद्धांतों पर गौर करें तो पश्चिमी अर्थशास्त्रियों का आधुनिकता
और विकास का सिद्धांत मूलतः सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) एवं औद्योगिकीकरण के
स्तर को विकास का आधार मानता था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद पिछडे देशों में नव
उपनिवेश की अवस्था में इन्होंने आधुनिकता के पश्चिमी मॉडल पर जोर दिया. यह
मूलतः चीन एवं रूस में खडे हो रहे एक समाजवादी विकल्प को नकारता था. मार्क्स ने
अपने विकास के सिद्धांत में सामंतवाद या पूर्व पूंजीवादी संबंधों के विनाश पर
औद्योगिकीकरण की बात की थी. पश्चिमी अर्थशास्त्रियों का आधुनिकता का सिद्धांत
1970 के बाद ही गरीब देशों में बुरी तरह विफल साबित हुआ. अब साम्राज्यवादी
देशों के अपने संकट को भी हल करने केलिए विश्व बैंक एवं अन्य साम्राज्यवादी
संस्थाओं ने इसी सिद्धांत को प्रोत्साहित किया.
बुद्धदेव ने भी इसी सिद्धांत को उधार लेते हुए इंडोनेशिया में घोषणा की कि कृषि
पिछडेपन की निशानी है, जबकि उद्योग विकास की. यह और कुछ नहीं, बल्कि
साम्राज्यवाद की दलाली थी. कृषि बुराई नहीं है बल्कि बुराई तो वितरण में भारी
असमानता, महाजनी में वृद्धि, बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए जगह बनाना, भारी
पैमाने पर शॉपिंग मॉल एवं उपजाऊ जमीनों को नष्ट करते हुए हाइवेज का निर्माण
करना है-जो बुद्धदेव सरकार ने किया है.सीपीएम के विकास की यह अवधारणा मूलतः
साम्राज्यवाद के हित में अपनायी जानेवाली अवधारणा है, जो कृषकों को और गहरे
संकट में धकेल देगी. इसके साथ ही साथ यह राज्य में और भयानक लूट को जन्म देगी.
उपजाऊ जमीनों के भयानक पैमाने पर अधिग्रहण से खाद्यान्न उत्पादन में और गिरावट
होती तथा एक बडी जनसंख्या और बदहाली में जियेगी. लेकिन नंदीग्राम ने स्पष्ट कर
दिया है कि यह सरकार अपनी साम्राज्यवादपक्षीय नीति के खिलाफ उठनेवाली हरेक आवाज
को खूनी पंजों से मसल देगी.
सीपीएम ने अपने तमाम विपक्षियों के साथ यही भूमिका निभायी है. इनके खिलाफ खडी
होनेवाली तमाम ताकतों को शुरू से ही भयानक सशस्त्र दमन का शिकार होना पडा है.
सीपीएम ने कभी भी अपने खिलाफ विपक्ष को पनपने नहीं दिया. वह उन्हें भू्रण रूप
में ही मसल देती है. सीपीएम की 30 सालों की सफलता का यही राज है. लेकिन जिन
इलाकों में प्रतिरोधी स्वर ने लगातार सीपीएम के खिलाफ संघर्ष जारी रखा अब
सीपीएम वहां अस्तित्व की लडाई लड रही है. गरबेटा इसका उदाहरण है और अब वहां के
इनके गुंडे नंदीग्राम एवं सिंगुर में काम आ रहे हैं. नंदीग्राम में तो सीपीएम
के नेताओं ने स्वीकार भी किया है कि वे इस तरह से इलाकों को अपने हाथ से नहीं
जाने दे सकते (तहलका). अर्थात पश्चिम बंगाल में वही विपक्ष में खडे रह सकता है,
जो सीपीएम की गुंडावाहिनी का प्रतिरोध कर सके. शायद इसी प्रतिरोध का भय उन्हें
माओवादियों से होता है. सीपीएम ने बार-बार कहा कि नंदीग्राम में हिंसा इसलिए
हुई चूंकि वहां माओवादी थे. अर्थात अगर वहां माओवादी नहीं होते तो सीपीएम
शांतिपूर्ण तरीके से अपना पूरा काम निबटा लेती.
1970 से ही सीपीएम पर सामाजिक फासीवादी होने के आरोप लगते रहे हैं. ये आरोप
धीरे-धीरे सही भी साबित हुए हैं. सामाजिक फासीवाद एवं सांप्रदायिक फासीवाद एक
ही सिक्के के दो पहलू हैं. नंदीग्राम ने तो यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है.
सीपीएम पर नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों को लेकर कई सांप्रदायिक आरोप लगते रहे.
यह महत्वपूर्ण है विपक्षहीन बंगाल में नंदीग्राम ने वास्तविक विपक्ष की भूमिका
निभायी है. उसने अपने प्रतिरोध संघर्ष को सालभर तक टिका कर रखा है.
अब नंदीग्राम को फतह कर लिया गया है. ठीक उसी तरह जैसे पेरिस कम्यून से लेकर
रूस, चीन एवं अन्य देशों में जीते सर्वहारा की सत्ता पर फिर से पूंजीवादियों की
फतह! ठीक वैसा ही जश्न जैसे हरेक विद्रोह को कुचलने के बाद सत्ता का जश्न!
तो क्या अब उम्मीद कविता की आखिरी पंक्ति में भी नहीं बची रह पायेगीङ्क्ष क्या
फिल्मों के समापन दृश्य में बच्चों की किलकारियां असंभव बना दी जायेंगी?
चिडियों की उडान से महकते आसमान और चींटियों के सपनों से भरी जमीन की दुनिया
खत्म हो जायेगी? क्या बसंत अब फिर नहीं आने के लिए आखिरी बार जा चुका हैङ्क्ष
लेकिन युद्ध के मोरचे पर आगे बढना या पीछे हटना युद्ध का हिस्सा है. युद्ध में
पीछे हटना हथियार डालना नहीं होता है. जनता के सपने अब भी जिंदा हैं.
सुना है नंदीग्राम में इस बार की फसल नहीं बोयी जा सकी है.
सुना है परती खेतों में लोगों की लाशें हैं और ईंट-पत्थर हैं.
मगर नंदीग्राम की मिट्टी में उम्मीद की जो फसल लहलहा रही है उसके बारे में क्या
किसी ने नहीं सुना है?
आइए, इस नयी फसल के स्वागत में हम सभी खडे हों-हाथ उठाते हुए.
--
REYAZ-UL-HAQUE______________________________
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