[दीवान]बनने की जगह सिमटती दिल्ली
Ravikant
ravikant at sarai.net
Mon Nov 26 13:05:45 IST 2007
सहारा हस्तक्षेप से साभार:
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बनने की जगह सिमटती दिल्ली
70-80 के बीच एनसीआर में माइग्रेशन काफी हुआ। इंडस्ट्री में बेतरतीब इजाफा हुआ। प्रवास करने वाले
लोगों का श्रमिकों के तौर पर पुरजोर स्वागत हुआ। 80 आते-आते स्थिति बदली और प्रवासियों के
प्रति उपेक्षा शुरू हो गई। इसके बाद इन्हें शहर से बाहर खदेड़ने की बात होने लगी
- अवधेंद्र शरण, रिसर्चर सीएसडीएस
दिल्ली बनने के बजाए सिमट रही है। बाहर के लोगों के ख्याल में दिल्ली जितनी खुली और अपनी लगती
है, उतनी ही वो पाबंदी में आती जा रही है। यह सच लुटियन की दिल्ली में रहने वालों का नहीं।
इससे ट्रांस यमुना और एनसीआर क्षेत्रों के गरीब जूझते हैं। पुनर्वास और विस्थापन के खेल के मोहरे ही
इससे रूबरू हैं। विस्थापन को लेकर एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब दिल्ली में लोगों की भीड़
ही नहीं होगी तो जगह सांस कैसे लेगी। आखिर शहर का जीवन और जायका तो लोगों से ही है। जाहि
र है सत्ता को इस प्रश्न से कोई मतलब नहीं। सत्ता बस एक मुनादी करती है और बस्तियों में
अफरा-तफरी का माहौल बन जाता है। लोग सामान समेटने लगते हैं। गठरियां बनाई जाने लगती हैं।
फिर बुलडोजर सारी रामकहानी खत्म करने में जुट जाता है। सरकार पुनर्वास नाम की जिस उम्मीद
का चारा देती है, वो भी आगे टूट जाता है। दरअसल शहरी पुनर्वास की स्थिति नदी घाटी परियो
जनाओं से काफी अलग है। एनसीआर हो या मुंबई का धारावी, यहां का विस्थापन गैरकानूनी जमीन के
नाम पर होता है। परियोजनाओं से जुड़े विस्थापन में आप जमीन के मालिक होते हैं जबकि यहां
आपकी स्थिति कानून तोड़ने वाले कमोबेश एक मुजरिम जैसी होती है।
दिल्ली में विस्थापन आज से 60 साल पहले भी होता था, किंतु तब स्वास्थ्य और अन्य समस्याएं इसका
आधार थीं। लोगों की भलाई ही विस्थापन का लक्ष्य था। देश में आपातकाल के बाद यह प्रवृति बदली
। अब यह सवाल नहीं उठता कि विस्थापन से लोगों के स्वास्थ्य पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। अब सिर्फ
कानून के डंडे की बात चलती है। आवास को या तो कानूनी बताया जाता है या गैरकानूनी। बीच की
स्थिति के लिए कोई जगह नहीं बचती। 1962 का दिल्ली का मुख्य मास्टर प्लान जब बना तो कहा
गया कि शहर में गरीबों के लिए जगह होनी चाहिए। आपत्ति थी भी तो ग्रामीणों के ग्रामीण
तरीकों को लेकर। निषेध यह तय हुआ था कि शहर के ग्रामीण तबेला नहीं रखेंगे। उपले पर खाना नहीं
बनाएंगे आदि-आदि। इससे पूर्व जी डी बिड़ला कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि आजादी के
बाद स्वतंत्र देश के शहरों में ग्रामीण नागरिकों के लिए जगह होनी चाहिए। बाद में भारत सेवक समा
ज ने एक रिपोर्ट में भी यही बात कही। 80 के दशक में इस विचार को जगह मिलनी बंद हो गई।
70-80 के बीच एनसीआर में माइग्रेशन काफी हुआ। इंडस्ट्री में बेतरतीब इजाफा हुआ। प्रवास करने वाले
लोगों का श्रमिकों के तौर पर पुरजोर स्वागत हुआ। 80 आते-आते स्थिति बदली और प्रवासियों के
प्रति उपेक्षा शुरू हो गई। इसके बाद इन्हें शहर से बाहर खदेड़ने की बात होने लगी। खूबसूरती के नाम
पर शहर से गरीब, काश्तकार, किसान उजाड़े जाने लगे। शहरों की सफाई का यह तरीका बेहद क्रूर
और बेशर्मी भरा है। राजनेताओं ने ‘कट ऑफ डेट’ नाम का जो तरीका निकाला था वह न्यायालय के
दबाव के आगे कारगर नहीं हुआ। फिर तरह-तरह की संस्थाएं बस्तियों को साफ करने की बात कहने लगीं
। अब गरीबों के लिए किसी खास दुश्मन को चिह्नित करना मुश्किल हो गया। बस्तियां हटाने के लिए
गरीबी नहीं कानून के तर्क की बात की जाने लगी। शहर की जोनिंग की जाने लगी जिसका भारतीय
संदर्भ में कोई विशेष औचित्य नहीं था। जोनिंग का फार्मूला- औघोगिक क्रांति के बाद जिन पश्चिमी
शहरों की हालत काफी खराब थी, वहीं से आया। मूलत: यह आइडिया अमेरिका, जर्मनी से आया। शहर
को अच्छा करने के लिए जोनिंग सही तर्क नहीं है। इसके विरोधियों की साफ राय है कि यह भारतीय
शहरों के लिए मुफीद नहीं है। फिर यह अमीरों के फायदे के लिए है।
अभी दिल्ली में जिस मास्टर प्लानिंग की बात चल रही है वह जोनिंग सिस्टम पर ही आधारित है।
यहां के सारे नियोजक प्रारंभ में जोनिंग के पक्ष में थे किंतु अब ऐसी स्थिति नहीं है। जोनिंग का
लॉजिक 100 साल पुराना पड़ चुका है। पहले चमड़े, मांस आदि उघोगों को शहर से बाहर करने के नाम
पर यह शुरू हुआ था जो आज भी जस का तस है। जोनिंग का कान्सेप्ट मिश्रण के खिलाफ है, और मिश्रण
भारतीय समाज की एक विशेषता रही है। नए परिप्रेक्ष्य में जोनिंग पर टेक्निकल बहस की जरूरत है।
इसके फायदे के पक्ष में बताया जाता है कि यह प्रदूषण को खत्म करता है। किंतु प्रदूषण को खत्म करने
के अन्य विकल्पों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसे ध्वनि प्रदूषण कम हो। इसके लिए आप साउंड
बफर का इस्तेमाल कर सकते हैं। जोनिंग अगर पॉल्यूशन के बचाव का माध्यम है तो उघोगों के साथ-साथ
कारों की बढ़ती संख्या पर भी लगाम लगायी जानी चाहिए। लेकिन सरकार इसके प्रति प्रतिबद्धता
नहीं दिखती। फिर यह भी देखिए कि जैसे दिल्ली से उघोगों को हटाने की बात उठी, राजस्थान व
हरियाणा की सरकारों ने उन्हें अपने यहां बसने का आमंत्रण दिया। इससे साफ है कि आप प्रदूषण को
हल नहीं कर रहे बल्कि उसे एक से दूसरी जगह स्थापित कर रहे हैं। गाजीपुर में मांस फैक्टरी स्थापित
करना भी यही साबित करता है। यहां शहर नियोजकों की इस मानसिकता की भी पोल खुलती है कि
वो सिर्फ एलीट वर्गों के लिए साफ-सुथरी व्यवस्था चाहते हैं, पूरे समाज के लिए नहीं। दिल्ली में मौ
जूद यह सोच अमेरिका में 50–60 के दशक में मौजूद नस्ली आंदोलन के पूर्व की सोच से मिलती-जुलती है।
वहां निम्बी यानी नॉट इन माई बैकयार्ड अभियान चला जो कालों के खिलाफ था। अभियान के पीछे
गोरों की यही मंशा थी कि काले कहीं भी जाएं, उनके घरों के आसपास न रहें।
यहां गौर करने लायक बात है कि हम जब भी विस्थापन का विरोध करते हैं, घूम फिर कर मामला गरी
बी पर आकर टिक जाता है। मेरी समझ में आज टेक्नालॉजी और प्लानिंग का सवाल अहम है। फिर पब्लि
क डिबेट में जो समस्याएं आ रही हैं, उन्हें भी हाइलाइट करें। चूंकि शहर के विस्थापन में अब कानून का
डंडा प्रभावी है, इसलिए इनसे नए तरीके से निबटना होगा। ‘पॉलिटिकल सोसायटी’ का हस्तक्षेप
अब इस मामले में कमता जा रहा है या फिर उसमें विरोधाभास बढ़ रहे हैं। जैसे दिल्ली में कांग्रेस की
सरकार तय करती है कि मांस फैक्टरी को मध्य दिल्ली से हटाकर गाजीपुर में स्थापित किया जाए,
तो उनकी ही पार्टी के सांसद व मुख्यमंत्री के बेटे इसका विरोध करते हैं। फैक्टरियों व लोगों को
शहर के दायरे से बाहर फेंकते जाना ही आज की सचाई है। बहस इस चीज पर केंद्रित कर दी गई है कि
बस्ती रहे या न रहे, फैक्टरी रहे या न रहे, पर्यावरण सुरक्षित रहे। होना यह चाहिए कि बस्तियों
या फैक्टरियों का वातावरण बहस के केंद्र में आए। वहां बेहतर तकनीकों का प्रयोग हो यह देखा जाए।
स्लम के भीतर रहने वाले लोगों की स्थिति मुद्दा नहीं बनी है। हमें स्वास्थ्य और काम की जगह बेहतर
करने के अभियान में जुटना होगा। ठोस वैकल्पिक व्यवस्था किए बगैर अगर बस्तियों को उजाड़ने का सि
लसिला बंद नहीं हुआ तो समाज विखंडित होगा। गैर-बराबरी बढ़ेगी और असंतोष की चिंगारी में लोग
प्रतिरोध करने आगे आएंगे। केवल शहरों को आदर्श बनाने की जगह पूरे देश को आदर्श बनाने की बात की
जानी चाहिए। लोगों के जीवन-मरण का प्रश्न है इसलिए कोताही बरतने की कोई गुंजाइश न छोड़ी
जाए।
(आलेख प्रवीण कुमार से बातचीत पर आधारित)
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