[दीवान]अगली पीढी में नंदीग्राम पर चर्चा
Rakesh Singh
rakeshjee at gmail.com
Wed Nov 28 18:17:18 IST 2007
प्रिय मित्रों
नंदीग्राम पर अपनी सतही समझ साझा कर रहा हूं आपसे. जैसा लगे बताइएगा.
सलाम
राकेश
अगली पीढी में नंदीग्राम पर चर्चा
नंदीग्राम. मेरे ख़याल से हमारे बाद की पीढ़ी इसे जालियावाला बाग की तरह याद
करेंगे. फ़र्क के तौर पर वे ये भी ज़रूर कहेंगे कि जालियावाला बाग में
निहत्थों पर गोली चलाने वाले अंग्रेज़ थे. तब देश गुलाम़ था. संघर्ष आज़ादी की
हो रही थी. नंदीग्राम 21वीं सदी के शुरुआती सालों की बात है. तब हिन्दुस्तान
अपनी जनता समेत आज़ाद था. नंदीग्राम जिस राज्य में पड़ता है वहां लोकतंत्र के
सबसे बड़े पैरोकार मार्क्स के वंशजों की ही एक किस्म की सरकार थी. उसके पास
लाल झंडे थे. जो बड़े-बड़े डंडों में लगाकर लहराई जाती थी. नंदीग्राम में जब
निहत्थे और निर्दोष लोगों पर अत्याचार हो रहा था तब समंदर में हिलकोरे लेते
पानी की तरह लहराते झंडे वाले डंडे भी बरसाए गए थे.
अगली पीढ़ी तक ये कहानी भी पहुंचेगी कि नंदीग्राम की जिस ग़रीब, अल्पसंख्यक
जनता पर कहर बरपा, उसी का नाम लेकर वहां तीस से भी ज़्यादा बरसों से एक ही दल
का शासन चलता आ रहा था. ये भी चर्चा होगी कि नंदीग्राम को इससे पहले कोई नहीं
जानता था. वो तो सरकार की तरफ़ से वहां की जनता की छोटी-मोटी जोत क़ब्ज़ा करने
की जबरिया कोशिश हो रही थी. जनता ने उस कोशिश का विरोध किया था. बदले में सरकार
जो अप्रत्यक्ष रूप से लाल झंडा थामे कैडर थी, ने उनकी अच्छी कुटाई-पिसाई की
थी. वे यह भी याद करेंगे कि अंग्रेज तो इक्के-दुक्के मौक़ों पर ही खदेड़ कर
मारते थे लेकिन नंदीग्राम में ज़्यादातर मार खदेड़-खदेड़ कर ही हुई थी. जब तक
दम नहीं निकल गया लोगों का, उन पर वार रूका नहीं था.
लोग पुलिस-प्रशासन के ईमान पर भी सवाल खड़ा करेंगे. कहेंगे कि देखो न जब
नंदीग्राम में ग़रीब-मज़लूमों को सिर पर लाल चुनरिया बांधे कैडर मार-काट रहे थे
तो कैसे पुलिस-प्रशासन वाले कान में तेल डालकर सो रहे थे. कोई हरकत नहीं. कोई
कार्रवाई नहीं. कैडर वाले देस में राम-राज्य-सा काम. फिर वो याद करेंगे
राम-राज्य को. कैसे राम-राज में संपूर्ण क्रांति के नायक लोकनायक के चेले के
पूरे अमले ने 2002 में अल्पसंख्यकों के घरों के पते-ठिकाने मुहैया करवाए थे
कट्ठा, तलवार, त्रिशूल, पेट्रोल की शीशी धारण किए केसरिया-वाहिनी के लड़ाके को.
वो ये भी याद करेंगे कि कैसे किसी कौसरबानो की कोख से उसकी अजन्मी बिटिया
चीख-चीख कर अपनी मां की हिफ़ाज़त की भीख मांग रही थी, और केसरिया पलटन के
गुर्गों ने उसकी एक न सुनी. उस वक़्त वे ये भी याद करेंगे कि
कैसे आज भी उस देस के प्रवेश द्वार पर भारतीय संविधान को सौ-सौ अंगूठा
दिखाते 'हिन्दू-राष्ट्र
में आपका स्वागत है' का गुजराती तजुर्मा बोर्डों पर ताल ठोंके खड़ा है. ज़रा
बोल के कोई देख ले हिन्दू की जगह कोई और राष्ट्र. टांग ले मुस्लिम या इसाई,
सिख, बौद्ध, जैन या किसी और राष्ट्र में आपका स्वागत है का इंच भर का
पट्टा!देखिए खाकी वर्दीधारी उसकी क्या गत बनाते हैं!
देखिए देश के किन-किन अदालतों में उन पर कितने किस्म के मुक़दमे लादे जाते हैं!
देखिए कैसे वो रातोंरात देशद्रोही बन जाता है! बहुत संभव है अगली मुठभेड़ के
बाद उसकी बदशक्ल अख़बारों की सूर्खी बने.
नंदीग्राम पर बतियाते हुए तब वे लोग ये भी बात करेंगे कि उस
'हिन्दु-राष्ट्र'और इस
'लाल-मुल्क' में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं रह गया था. पुलिस-प्रशासन दोनों ही जगह
सरकारी पैसे पर केवल इसलिए पाले जा रहे थे कि वे आताताइयों की हिफ़ाज़त करें.
ग़रीब-मेहनतकश जनता से उसका कुछ लेना-देना नहीं था. हां, मौक़े-बेमौक़े वे
आताताइयों के साथ खड़े हो जाते थे.
कहानी ये भी वाची जाएगी अगली पीढी में कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी वोटों के
चक्कर में दुर्गम स्थलों तक का दौरा करने वाले या छोटी-से-छोटी घटना पर बात का
बतंगड़ बनाने के लिए दुर्घटनास्थलों का हवाई सर्वेक्षण करने वाले
'राष्ट्रीय'नेताओं में से कोई भी नंदीग्राम नहीं गया था. सारी सफ़ाई और
लिपापोती दिल्ली के
विभिन्न हेडक्वार्टरों से ही होती रही थी. और तो और तत्कालीन सरकार को दिशा
निर्देश देने वाली युपीए चेयरपर्सन भी नहीं गयी थीं उस इलाक़े में. जाना तो
छोड़ दीजिए ज़्यादातर वक़्त कुछ बोली भी नहीं थी. बिल्कुल ख़ामोश रही थीं. पता
नहीं क्यों?
शायद उस पीढ़ी के लोग ये भी जानना चाहेंगे कि आखिर कैसे हुआ नंदीग्राम? कैसे
कैडर वाले देस में कैडरी-सरकार अपनी जनता के लिए अत्याचारी हो जाती है? कैसे
जमा हुए लोग? कैसे ग़रीब-गुर्बों ने कैडर वाली सरकार की चूलें हिलाकर रख
दी?कौन था उनका लीडर?
इस ज़माने के अख़बारों और विडीयो फ़ुटेज को मेग्निफ़ाइंग लेंस लगाकर छान लेना
चाहेंगे लोग. जान लेना चाहेंगे नंदीग्राम जनांदोलन के नेता के बारे में. काफ़ी
थक-हार जाने के बाद भी जब कोई ख़ास जानकारी उनके हाथ नहीं आएगी सिवाय
तात्कालिक तौर पर बाहर से गए कुछ नामी-गिरामी हस्तियों के, जिससे नंदीग्राम के
संघर्ष को राष्ट्रीय मानचित्र पर आने का मौक़ा मिला; तब वे शायद इस निष्कर्ष पर
पहुंचेंगे कि अगर मुद्दा आम लोगों की जिन्दगी से जुड़ा हो, ग़रीब-मेहनतकशों की
रोजी-रोटी और आत्मसम्मान से जुड़ा हो, तो उनके बीच से भी अनाम गांधी और भगत
सिंह पैदा हो सकते हैं. और पिछले गांधी और भगत सिंह से सीख लेते हुए वे अपनी
कार्रवाई को ज़्यादा संगठित रूप से अंजाम दे सकते हैं.
--
Rakesh Kumar Singh
Researcher & Translator
Delhi, India
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''सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना''
- पाश
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