[दीवान]एक अपील
Rajesh Ranjan
rajeshkajha at yahoo.com
Thu Nov 1 17:10:13 IST 2007
करूणाकर जी,
पत्रिका के लिए विकी पेज जल्द से जल्द बना ही डालिए...ताकि हमारे 'दीवान-ए-मित्र' अपनी अपनी भड़ास वहां निकाल सकें .
इससे पत्रिका के काम को आगे बढ़ाने और इकट्ठा एक जगह करने में भी मदद मिलेगी.
राजेश रंजन
----- Original Message ----
From: Ravikant <ravikant at sarai.net>
To: deewan at sarai.net
Sent: Thursday, October 25, 2007 6:08:03 PM
Subject: Re: [दीवान]एक अपील
राजेश, आलोक
माफ़ करना यारो. कई सारी
उलझनें थीं. आलोक काफ़ी
व्यवस्थित इंसान हैं, वो कुछ सवाल
बक़ायदा
लिखकर लाए थे, जो शायद मेरे
जैसे अव्यवस्थित इंसान से
चर्चाक्रम में बिखर गया हो.
मुझे जो चीज़े
याद हैं, उन्हें दुहराने की
कोशिश करता हूँ.
1. पहला सवाल कॉपीराइट को
लेकर था, कि अगर हम जहाँ-तहाँ,
जैसे कि ब्लॉग की
दुनिया से सामग्री
उठायेंगे तो क्या स्वत्वाधिकार-हनन
नहीं होगा? कितना भयानक शब्द
है ये, और
उससे भी ज़्यादा तो आजकल
चालू *सर्वाधिकार* ... देखना है
कहीं सर्वस्वाधिकार न हो जाए!
ख़ैर
मज़ाक छोड़ते हुए, इस मसले
पर दिलचस्प बात हुई, जिसमें
पूरा अमेरिकी औद्योगिकरण का
इतिहास
और इसके आलोक में उसकी
मौजूदा चौधराहट, इन सबकी
चीड़-फाड़ की गई. ये भी ग़ौर किया गया
कि
नेट पर चालू रिवाज हिन्दी के
'साभार'-रियाज़ से काफ़ी मेल
खाता है, अगर विकिया के
हिन्दी
संग्रह की सनद मानें.
लिहाज़ा, हम चोरी नहीं करेंगे कि
कुछ चुपचाप उठा लिया. हम कुछ भी
लेंगे शरा
फ़त से बताकर लेंगे, इजाज़त
लेकर लेंगे और पत्रिका में
यथायोग्य उसको अक्नॉलेज
करेंगे
बाक़ी जो सज्जन मिल्कियत
पसंद हैं, वे जानें, उनका धर्म
जाने!
2. हम ऑपरेटिंग सिस्टम के
बारे में खुला रवैया लेकर
चलेंगे. वैसे हमारे साथियों में कई
लोग मुक्त
सॉफ़्टवेयर के हिमायती हैं,
पर भाषाई कंप्यूटिंग को
अंततः इससे आज़ाद ही रखा जाए तो
बेहतर है. वैसे
भी तकनीकी तौर पर दुनिया अब
नेट-केन्द्रित होती जा रही
है. तो हम मुक्त की वकालत करते
हुए,
किसी भी अच्छे औज़ार की
चर्चा करेंगे, उसकी तह में जाने
की कोशिश करेंगे और उम्मीद
करेंगे कि इन
तंत्रों में भाषाई औज़ारों
के मामले में भी एक स्वस्थ
होड़ चलती रहे. कुछ भी
अग्राह्य नहीं है. मसलन
अगर मैक का देवनागरी फ़ॉन्ट
अगर सबसे अच्छा बन पड़ा है
तो यह तो लिनक्स और विन्डोज़
वालों के
लिए सहज ही चुनौती है, और
उन्हें इसे उसी तरह लेना होगा.
हम इस स्पर्धा-भाव को मंद-मंद
हवा
दे सकते हैं.
3. नेटाचार: नेट की कोई तहज़ीब
होती है या होनी चाहिए,
हमारा समाज इससे लगभग अनजान है,
यह बहस छेड़ने की ज़रूरत
महसूस होती है पर कोई नैतिक
लबादा ओढ़े बिना. उसी तरह
सुरक्षा,
और सावधानी को लेकर भी
उपयोगी बातें की जाएँ.
4. जहाँ तक रवैये की बात है
आलोक का निश्चित मत था कि हमें
निराशावादी नहीं होना चाहिए,
न
ही हमें कभी भाषणबाज़ी करनी
चाहिए.
5. उसी तरह, हम प्रशंसात्मक
पत्र नहीं छापेंगे, कुछ ख़याल
होगा, छपी हुई सामग्री में
अगर कुछ रमा-रमी झलके तो ही
छापेंगे.
पाटकों से सवाल-जवाब का
रिश्ता हो, एक-दो पन्ने का.
6. मियाद क्या होगी - हर दो
महीने या हर तीन महीने? मेरे
ख़याल से तीन महीने में एक बार.
कुछ और विषय जो हमारी बातचीत
में उभरे:
क. तकनीकी इतिहास,
कालक्रम/कालरेखा के साथ. कंप्यूटरी का,
नेट का नेट पर स्थित कई
विधाओं
का.
ख. खोज पर लगातार लिखा जाए -
क्या, कैसे??
ग. भाषा और तकनीकी के रिश्ते
पर बहुत कुछ परोसा जा सकता है
- इतिहास, लेखन-विधि, उसके
बदलाव आदि पर.
अनुवाद पर भी, हमारे पास
काफ़ी सामूहिक तजुर्बा है अब तक.
घ. कुछ मददगार ट्यूटोरियल तो
दिए ही जाएँगे. लिनक्स क्या
है? से शुरू करते हुए: एक
स्थायी स्तंभ
चलाया जाए. रवि श्रीवास्तव
ने कई औज़ारों पर समीक्षाएँ
लिखी हैं, उन्हें अद्यतन करते
हुए
पेश किया जाए, बेशक एक स्तंभ
यह भी.
च. चिट्ठाजगत के माहिर तो कई
हें इस सूची डाक-पर, पर
बच्चों के चिट्ठों के बारे में
आलोक की जा
नकारी है, वे लिखेंगे. वे आशा
जोगलेकर नामक महिला से भी
बात करेंगे, लिखने के लिए.
बहरहाल
उनका ब्लॉग ये रहा: ashaj45.blogspot.com
वग़ैरह-वग़ैरह. घटे-बढ़े की
भरपाई आलोक करेंगे.
हाँ यह भी तय हुआ कि विकी पेज
बनाया जाए काम के लिए, जिसके
बारे में मैंने करुणाकर को
भी बता
दिया है. उसका कहना है कि इस
हफ़्ते के अंत तक हो जाएगा.
एकाध प्रकाशक से भी उत्साहजनक
बात
हुई है, लेकिन नाम मैं, उनसे
मिलने के बात निर्णय होने पर
ही बताऊँगा, मुझे लगता है एक
पूरा
प्रेज़ेन्टेशन देना होगा
उनको. नीलिमा, विजेन्दर,
प्रमोद जी और अविनाश से भी कुछ ठोस,
कुछ
हल्की बातें हुई हैं.
तो ये तो रही हमारी करतूत...
आप सब आगे आएँ, बात बढ़ाएँ,
ताकि निकल ही चुकी है तो दूर तक
जाए.
नाम का सवाल रह गया: आज मैं
सोच रहा था: कंप्युत्रिका =
कंप्यूटर+पत्रिका, थोड़ा
सीमित-सा
लगता है, अभी तक कुछ जँच नहीं
रहा है!
रविकान्त
गुरुवार 25 अक्टूबर 2007 14:33 को,
आपने लिखा था:
> साथियो,
>
> सबसे पहले हम सभी नामकरण
संस्कार करना चाहेंगे पत्रिका
का जो यथासंभव
> सर्वगुणसंपन्न हो... आपका
सहयोग जरूरी है! तो कुछ सुझाव
दीजिये, चर्चा चलाइये,
> दीवान लिस्ट के साथियों जो
भी संभव हो कीजिये...एक
बढ़िया सा नाम सुझा दीजिये.
>
> आलोकजी, रविकांतजी के साथ
अपनी बातचीत के हिस्सों को
लिस्ट पर रखने के लिए
> आपको आग्रह करने से मैं खुद
को रोक नहीं पा रहा हूँ.
>
> सादर,
> राजेश रंजन
>
>
>
>
>
> ----- Original Message ----
> From: आलोक कुमार <alok at devanaagarii.net>
> To: ravikant at sarai.net; deewan at sarai.net
> Sent: Monday, October 15, 2007 4:04:18 PM
> Subject: Re: [दीवान]एक अपील
>
>
> रविकांत जी,
> मुलाकात हुई, समय देने के
> लिए सार्वजनिक रूप से
धन्यवाद।
> आलोक
>
> 2007/10/10, Ravikant <ravikant at sarai.net>:
> > इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते
>
> हुए, आलोक जो चंडीगढ़ में
> हैं, और जल्द ही दिल्ली में
> होंगे, इस रविवार
>
> > को तक़रीबन 11 बजे मेरे घर
पर
>
> आएँगे और कुछ विचार विमर्श
> होगा. आपमें से जो सज्जन या
> सजनी
>
> > आना चाहें उनका स्वागत है.
>
> बातचीत का ब्यौरा दीवान पर
> डाल दिया जाएगा. ये वही
आलोक
> हैं,
>
> > जिन्हें हिन्दी का पहले
>
> ब्लॉगर के उपनाम से भी जाना
> जाता है - 9.2.11 की बदौलत.
>
> > रविकान्त
> >
> >
> > बुधवार 10 अक्टूबर 2007 13:37 को,
Rajesh
>
> Ranjan ने लिखा था:
> > > रविकांत जी के साथ ऐसी एक
>
> पत्रिका के लिए लगातार बात
> होती रही और मुझे यह खुशी
>
> > > है कि ऐसी पत्रिका व उसके
>
> स्वरूप पर चर्चा दीवान
> मेलिंग लिस्ट पर हो रही है.
>
> > > चर्चा के लिए दीवान
मेलिंग
>
> लिस्ट से बढ़िया जगह नहीं
> हो सकती थी. मैं मानना है
>
> > > कि दीवान लिस्ट से बेहतर
>
> शायद कोई मेलिंग लिस्ट
नहीं
>
> > > है जहां इतने सारे विषयों
>
> पर ऐसी गंभीर चर्चा लगातार
> हिन्दी में की जाती है.
>
> > > खैर, रविकांत जी का
>
> शुक्रिया कि उन्होंने
मेरा नाम
> "नेतृत्व" के लिए रखा.
>
> > > नेतृत्व शब्द इतना
>
> भारी-भरकम हो जाता है कि
कुछ
> भयानुभूति भी होने लगी है.
>
> > > इसका यह अर्थ न लिया जाये
>
> कि मैं काम के किसी बोझ से
> डरता हूँ या इस काम के
>
> > > लिए मेरे पास समय कम है...
>
> मैं इतना जरूर कहना
चाहूंगा कि
> ऐसी पत्रिका
>
> > > के लिए मैं लगातार
>
> प्रतिबद्ध व मिहनती
कार्यकर्ता की
> भांति काम करूंगा...
>
> > > आपके सुझाव व सहयोग की
>
> अपेक्षा है...विषय वस्तु,
अंतराल,
> आकार-प्रकार,
>
> > > रूप-रेखा, नामकरण आदि सभी
>
> चीजों पर आपकी राय जरूरी है
>
> > > राजेश रंजन
> > >
> > >
> > > ----- Original Message ----
> > > From: zaigham imam <zaighamimam at gmail.com>
> > > To: deewan at sarai.net
> > > Sent: Saturday, October 6, 2007 9:51:02 AM
> > > Subject: Re: [दीवान]एक अपील
> > >
> > > ज़रा उनका भी ख्याल
रखिएगा
>
> साहब जो नियमित ब्लागर
नहीं
> है। पत्रिका के शुरूआती
>
> > > प्रस्ताव पर हम सब इतने
>
> उत्साहित हैं....आगे क्या
होगा?
> शायद रविकांत जी को
>
> > > एकबार फिर अपील करनी
पड़े।
>
> मुक्तिका अनिमंत्रित
> सामग्री लौटाने के लिए
>
> > > जिम्मेदार नहीं है...कृपया
>
> गुणवत्तापूर्ण और पत्रिका
> के मिजाज से मेलजोल खाती
>
> > > रचनाएं ही भेजें।
> > >
> > >
> > > अनिमंत्रित सामग्री
>
> भेजने के लिए आतुर
>
> > > जै़गम
> > >
> > >
> > >
> > >
> > > On 10/5/07, Ravikant <ravikant at sarai.net> wrote:
> > >
> > > दोस्तो,
> > >
> > > रेडहैट के राजेश रंजन और
>
> मेरे बीच काफ़ी समय से इस
> प्रस्ताव पर मंथन चल रहा है
>
> > > कि हिन्दी में एक
> > >
> > > ऐसी पत्रिका निकाली जाए
जो
>
> भाषाई कंप्यूटिंग में चल
> रहे विभिन्न प्रयोगों को
>
> > > सामने ला सके. पिछले दिनों
>
> विजेन्द्र और अविनाश तथा
> प्रमोद जी से भी इस पर
>
> > > मुख्तसर सी चर्चा हुई.
>
> इसका एक फ़ायदा यह भी होगा
कि हम
> लोगों के एक ऐसे
>
> > > हिस्से से बातचीत कर
>
> पाएँगे,
>
> > > जिनमें तकनीकी दक्षता
>
> शायद कम हो पर जो
भाषा-प्रयोग के
> माहिर हैँ. इन लोगों को
>
> > > बहस में शामिल किए बिना
>
> हमारी सारी कोशिशें अधूरी
> होंगी. हमने छोटे पैमाने
पर,
>
> > > समय-समय पर, यह कोशिश की है,
>
> ख़ास तौर पर इंडलिनक्स की
> समीक्षा कार्यशाला
>
> > > आयोजित करके
> > >
> > > या हिन्दलिनक्स ख़बरनामा
>
> निकालकर. हमारी पहुंच तब भी
> सीमित थी अब भी है. पर अब
>
> > > संदर्भ बदल गया है, और
>
> भाषाई कंप्यूटिंग करने के
औज़ार
> जल्द ही प्लैटफ़ॉर्म से
>
> > > आज़ाद होते चले जाएँगे.
>
> फिर कुछ बुनियादी
ज़रूरतेँ सब
> की एक जैसी हैँ - मिसाल
>
> > > के तौर पर हमें अच्छा
>
> स्पेल-चेकर चाहिए, तो अगर
>
> > > एक भाषा में यह बन जाता है
>
> तो तकनीकी सफलताओं का
फ़ायदा
> दूसरे भाषा-भाषियों को
>
> > > भी मिलेगा. अभी तो समस्या
>
> यह है कि यह रचनात्मक काम
बहुत
> कम लोगों तक महदूद
>
> > > है.
> > >
> > > संदर्भ इसलिए भी बदल गया
>
> है क्योंकि जैसाकि नीलिमा,
> गिरीन्द्र, राकेश और कुछ
>
> > > हद तक गौरी हमें
> > >
> > > बताती रही हैं कि ब्लॉगिए
>
> अब अपने फ़ुल फ़ॉर्म में
हैं -
> दनदनाते हुए चिट्ठिया
>
> > > रहे हैँ, तो कुछ सामग्री
तो
>
> हमें वहां से मिल जाएगी.
> मेरा अपना ख़याल है कि
>
> > > शुद्ध तकनीकी पत्रिका
>
> निकालने में उसके फ़ौरन
डूबने
> का ख़तरा भारी है, लिहाज़ा
>
> > > हम सार्वजनिक दिलचस्पी
की
>
> दीगर सामग्री भी
>
> > > डालेंगे, पर हमारा मूल
>
> उद्देश्य कंप्यूटिंग युग
में
> भाषायी प्रयोगों पर ही
>
> > > केन्द्रित होगा. मुझे
लगता
>
> है कि शुरुआती तौर पर हम एक
> त्रैमासिक पत्रिका
>
> > > नकालें, जिसका संपादनादि
>
> अवैतनिक हो, और जिसके
प्रकाशन
> के लिए किसी प्रकाशक को
>
> > > भी पकड़ सकते हैं. हमारी
>
> जेब से कुछ न जाए.
>
> > > ज़ाहिर है ऐसी पत्रिका आप
>
> सबके सहयोग के बिना नहीं
> निकल सकती. लिहाज़ा मैं
>
> > > आपसे आपके वक़्त का दान
>
> लेने कि लिए कटोरा लेकर
हाज़िर
> हुआ हूँ. हमारे अपने
>
> > > कुछ ख़यालात हैं, पर हम
>
> पहले कहकर सब कुछ बंद नहीँ
कर
> देना चाहते हैँ. तो सबसे
>
> > > पहला सवाल तो आप सबसे यही
>
> है कि क्या ऐसी किसी
>
> > > पत्रिका की दरकार है? अगर
>
> है, तो उसमें क्या-क्या
होना
> चाहिए?
>
> > > और कौन-से लोग इससे जुड़ना
>
> चाहेंगे?
>
> > > काम यही करना होगा कि हम
>
> विकी जैसी एक ऑनलाइन जगह
> रखेंगे जहाँ एक साथ सारी
>
> > > सामाग्री रख सकते हैँ बहस
>
> हो सकती है, संपादन भी हो
सकता
> है. आपको आलेख-संकलन,
>
> > > संपादन और हो सके
> > >
> > > तो डिज़ाइन आदि में मदद दे
>
> सकते हैं. हमारा नेतृत्व
> राजेश रंजन करेंगे,
>
> > > क्योंकि यह मूलत: उन्हीं
>
> का सपना है, और उन्ही के पास
> इसके लिए हम सबसे
>
> > > ज़्यादा वक़्त है. हम उनकी
>
> सलाहकार की भूमिका में हैं.
>
> > > जहाँ तक स्वयंसेवियों को
>
> ढूढने की बात है तो मुझे
लगता
> है कि कुछ लोगों को तो
>
> > > होना ही चहिए.
> > >
> > > रवि रतलामी, देबाशीष,
>
> विजेन्द्र, आलोक, अविनाश,
नीलिमा -
> ये कुछ ऐसे नाम हैं
>
> > > जो सहज ही याद आते हैँ. इन
>
> सबमें ग़ज़ब की
प्रतिबद्धता
> और नेतृत्व क्षमता देखी
>
> > > गई है. पर दीवान पर बातचीत
>
> शुरू करने के पीछे ख़याल ही
> यही है कि यह एक मुक्त
>
> > > प्रस्ताव है, आप इसे
>
> उपयुक्त लोगों को भेज सकते
हैं,
>
> > > उन्हें हम दीवान पर
>
> बुलाएंगे. मैं उम्मीद करता
हूँ कि
> करुणाकर और गोरा का
>
> > > सहयोग भी हमें मिलेगा.
>
> इनके अलावा रियाज़,
गिरीन्द्र,,
> रवीश आदि न जाने कितने
>
> > > लोगों ने ब्लॉग जगत में
>
> रचनात्मक हस्पक्षेप किए
हैं,
> जिनसे बाहरी दुनिया का
>
> > > परिचय कराना ज़रूरी लगता
>
> है.
>
> > > आप नीचे जाते हुए देख सकते
>
> हैं कि हमने एक खाका-सा
खींचा
> था - इसकी परिकल्पना
>
> > > करते हुए, उसे भी अभी खुला
>
> ही माना जाए, नाम भी अगर कोई
> बेहतर हो तो सुझाएं,
>
> > > वैसे मुझे अभी तक
मुक्तिका
>
> अच्छा लग रहा है. डिज़ाइन
हम
> ब्लॉग का ही रख सकते
>
> > > हैं, भले ही कवर उसके अंदर
>
> बदलता रहेगा. इतना
>
> > > बता दूँ कि यह सराय की
>
> पत्रिका नहीं होगी. हाँ इसे
मुक्त
> जनपद की पत्रिका माना
>
> > > जाए तो हमें कोई ऐतराज़
>
> नहीं है, पर जैसा कि मैंने
कहा
> भाषाई औज़ारों के मामले
>
> > > में हम संकीर्णता न बरतें
>
> तो सबका भला होगा....
>
> > > सहयोग की अपेक्षा में
> > >
> > >
> > > रविकान्त + राजेश रंजन
> > >
> > > ---------- आगे भेजे गए संदेश
>
> ----------
>
> > > Subject: आई-टी व प्रौद्योगिकी
>
> केंद्रित हिंदी पत्रिका
>
> > > Date: सोमवार 01 अक्टूबर 2007 15:54
> > > From: Rajesh Ranjan <
> > > rajeshkajha at yahoo.com>
> > > To: Ravikant <ravikant at sarai.net>
> > >
> > > रविकांत,
> > >
> > > मैंने जिस सामग्री को
>
> इंडलिनक्स पर डाला था वह
भेज रहा
> हूँ
>
> > > आगे सुझाव दीजिये क्या
>
> किया जाए.
>
> > > आपका
> > > राजेश
> > >
> > >
> > >
> > >
> > > आई-टी व प्रौद्योगिकी
>
> केंद्रित हिंदी पत्रिका
>
> > > हमारी भाषा हिंदी में एक
>
> तकनीकी जर्नल हो एक
पत्रिका
> हो ऐसी हमारी आकंक्षा
>
> > > रहती है. परंतु उसको
>
> व्यापकता में समेटने की
कोई कोशिश
> अभी तक नहीं हो
>
> > > पायी है. रविकांतजी ने
>
> अपने करोलबाग स्थित घर पर
देर
> रात बैठकर इसके लिये एक
>
> > > खाका तैयार किया है... विषय
>
> वस्तु का एक खूबसूरत
लेआउट...
>
> > > नाम : मुक्तिका / मुक्तक (
>
> एक अनियतकालीन पत्रिका)
>
> > > पूरे डिजिटल संस्कृति को
>
> समेटने की कोशिश करेगी यह
> पत्रिका
>
> > > मोटे तौर पर इन विंदुओं के
>
> गिर्द इसका ताना बाना बुना
>
> जा सकता है:
> > > १. औजार
> > >
> > >
> > > क. कंप्यूटर (हार्डवेयर व
>
> सॉफ्टवेयर)
>
> > > ख. मोबाइल
> > > ग. फिल्म व संगीत - तकनीक से
>
> जुड़ी बातचीत
>
> > > घ. कैमरा
> > > ङ. इंटरनेट - ब्लॉग, ईमेल,
>
> वेबसाइट
>
> > > इनसे जुड़े हाउ टू पर आरंभ
>
> में ध्यान देने की कोशिश की
> जायेगी....
>
> > > २. इतिहास - तकनीकी इतिहास
> > >
> > > ३. समाज - व्यक्तिगत
यात्रा
> > >
> > > ४. राजनीति - सरकार एक
>
> आलोचनात्मक पड़ताल की
कोशिश
> रहेगी, ई-गवर्नेंस,
>
> > > ई-लोकतंत्र
> > >
> > >
> > > ५. कानून - बौद्धिक संपदा,
>
> लाइसेंस, नकल की संस्कृति
>
> > > ६. गैर सरकारी संगठन व
उनके
> > > प्रयास आलेख हम मुक्त
>
> स्रोत से जुड़े संगठन,
सराय,
> ब्लॉगर
>
> > > और कुछ जाने माने लेखकों
>
> से लेने की कोशिश करेंगे..
>
>
>
>
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