[दीवान]महानुभावों! यह दमन का एक्सटेंशन ही तो है

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Sat Nov 3 00:11:29 IST 2007


महानुभावों! यह दमन का एक्सटेंशन ही तो
है<http://hashiya.blogspot.com/2007/11/blog-post_02.html>

<http://bp0.blogger.com/__ZySD_hi8E4/RysnKh5hHvI/AAAAAAAABKc/Ez-BhSxNjGY/s1600-h/DSC_0068-1.jpg>पत्रकारों
को पीटे जाने की घटना से उठे कुछ ज़रूरी सवालों को रेखांकित कर रहे हैं प्रभात
ख़बर के संपादक अजय कुमार.

महानुभावों! यह दमन का एक्सटेंशन ही तो है

अजय कुमार
बाहुबली विधायक अनंत सिंह और उनके समर्थकों द्वारा पत्रकारों को बंधक बना कर
पीटे जाने की खबर देश-दुनिया में जैसे ही फै ली, बिहार से बाहर के चार मित्रों
के एसएमएस मिले. चारों संदेशों के कॉमन बिंदु थे-`क्या बिहार नहीं सुधरेगा?
एसएमएस भेजनेवाले मित्रों में दो गैर बिहारी भी हैं.
यह सवाल ऐसे समय में पूछे जा रहे हैं, जब बिहार की ब्रांडिंग क रने की बात चल
रही है. पूंजी निवेश के लिए निवेशकों को बुलाने की पहल की जा रही है. बिहारी क
हलाना जहां गौरव की बात होगी, अपमान की नहीं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक
ही है कि `या सचमुच बिहार नहीं सुधरेगा? नवनिर्माण और पुनर्निर्माण की बातें तो
बहुत दूर की हैं.
आखिर खोट कहां है? जब इस व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक और जनता के प्रति
उत्तरदायी बनाने के उपाय तलाशे जा रहे हैं, दूसरी तरफ आम आदमी पर आफत बढ़ती ही
जा रही है. आखिर इस तंत्र का चेहरा लगातार मनुष्य विरोधी `यों होता जा रहा है?
भागलपुर के नाथनगर से लेक र पत्रकारों की पिटाई तक , इसकी एक लंबी शृंखला बनती
जा रही है. ऐसा क्यों है कि समाज के एक हिस्से को लगता है कि वह कुछ भी कर
लेगा, किसी को भी सबक सिखा देगा और फिर भी बचा रहेगा?
शायद बहुतों ने उम्मीद की थी कि जिन चीजों से बिहार की बदनामी होती रही है, वे
क्रमिक ढंग से डरावने अतीत का हिस्सा बन जायेंगी. लेकि न वर्तमान का सवाल
बार-बार सामने खड़ा हो जाता है-`या बिहार नहीं सुधरेगा?
अभिव्यति की आजादी जैसे बड़े सवालों को छोड़ दें, तो दमन की एक छोटी बानगी
देखिए. एक सरकारी उपक्रम के खिलाफ राजधानी में व्यवसायी संगठनों ने धरना दिया.
खबर छपने के बाद अखबारों पर मुकदमे कर दिये गये. पटना से छपनेवाले एक -दो
अखबारों को छोड़ कर सभी अखबार मुकदमे का सामना कर रहे हैं. यह बात सत्ताधारी दल
के शीर्ष लोगों को बतायी गयी. उन्होंने इस बात पर सहमति भी जतायी कि धरना की
खबर छपना मुकदमे की वजह नहीं हो सकता. पर वास्तविक ता यह है कि वह मुकदमा अब भी
चल रहा है.
अनंत सिंह मुकदमा नहीं कर सकते. उन्हें अपने बाहुबल पर भरोसा है. सो, उन्होंने
पत्रकारों को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उनकी जम कर धुनाई कर-करा दी. तो एक
तरह से अखबारों-पत्रकारों पर जो प्रकारांतर से दमन चल रहा है, यह घटना उसी का
विस्तार है.
डॉ जगन्नाथ मिश्र ने जब प्रेस बिल लाया था, तो देश भर में उसका तीखा विरोध हुआ
था. पत्रकार ही नहीं बल्कि अलग-अलग तबकों के लोगों ने उसका प्रतिवाद किया था.
बेशक , उसमें वे राजनीतिज्ञ भी थे, जो आज राज्य में पक्ष-विपक्ष की भूमिका में
हैं. व्यक्ति भले बदल गये हों, सत्ता का चरित्र वही है. और वह सवाल फिर खड़ा
है-`क्या बिहार नहीं सुधरेगा?


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REYAZ-UL-HAQUE______________________________
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