[दीवान]गो-वध बंदी पर संत गोपाल दास से बातचीत

brajesh kumar jha jha.brajeshkumar at gmail.com
Tue Dec 2 13:17:58 CST 2014


*संत गोपाल दास तिहाड़ जेल में बंद हैं। यहां पेश है 26 नवंबर को उनसे हुई
बातचीत के खास अंश। *


*नई दिल्ली * | संत गोपाल दास गो-वध बंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
को एक ज्ञापन देना चाहते थे। वे अपने समर्थकों के साथ संसद की तरफ जा रहे थे।
पुलिस उनपर लाठियां चलाईं। उनके खिलाफ कई धाराएं लगाकर तिहाड़ जेल में बंद कर
दिया। तिहाड़ जेल में ही बीते 1 अक्टूबर उन्होंने अनशन शुरू कर दिया।
31 अक्टूबर को हमलोग प्रधानमंत्री को ज्ञापन देने जा रहे थे। हमारे साथ गायें
भी थीं। करीब 150 महिलाएं थीं। रास्ते में अचानक रोका गया और पुलिस ने लाठियां
चलाईं। महिलाओं को भी पीटा गया। वह अमानवीय दृश्य था।

हालांकि, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संरक्षक केएन. गोविंदाचार्य की पहल पर
उन्होंने 27 दिनों बाद 26 नवंबर को अनशन तोड़ा। यहां पेश है तिहाड़ जेल में *संत
गोपाल दास* से हुई बातचीत के प्रमुख अंश।



*गोरक्षा का मुद्दा देश में पहले भी उठता रहा है और इस मुद्दे पर आंदोलन भी
हुए हैं। आपने भी गोरक्षा का बीड़ा उठाया है। आपकी योजना क्या है**? *

हमने जन-जागरण का बीड़ा जरूर उठाया है, लेकिन दुख की बात यह है कि सरकार ही इस
काम में बाधा डाल रही है। हालांकि, सरकार को भी गो रक्षा के लिए कुछ विशेष
प्रयत्न करने की जरूरत नहीं है। वह केवल गोचर भूमि सुनिश्चित करे और गाय की
तस्करी करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए। मैं समझता हूं कि अभी की परिस्थिति
में सरकार इन दोनों कदमों को उठाती है तो वह गो माता की रक्षा के लिए पर्याप्त
होगा। वैसे भी भारतीय जीवन पद्धति में समाज का गाय से गहरा आत्मीय संबंध है।
वे एक दूसरे के पूरक हैं। यदि एक को क्षति पहुंचेगी तो देर-सबेर दूसरा भी नष्ट
हो जाएगा और इसके परिणाम भयावह होंगे।



*जो लोग गोरक्षा की बात करते रहे हैं**, **वे आज सत्ता में हैं। आप उनसे संवाद
क्यों नहीं करते**?  *

मैं आपके सामने तिहाड़ जेल में बंद हूं। बाहर हमारे साथी यही कोशिश कर रहे
हैं। वे दर-दर भटक रहे हैं। सत्ता में बैठे लोग हमारी बात तक सुनने को तैयार
नहीं हैं। देश के जो बड़े सांस्कृतिक संगठन हैं, उनका भी सहयोग नहीं मिल रहा
है। यहां लोग गो रक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी बात करते हैं, लेकिन जब कोई संघर्ष
के लिए आगे बढ़ता है तो उनका कोई अता-पता नहीं मिलता।



*यह बताया जा रहा है कि गो रक्षा के नाम पर आप और आपके सहयोगी कानून**-**व्यवस्था
को हाथ में ले रहे हैं। इसमें कितनी सच्चाई है**? *

यह आरोप बेबुनियाद है। 31 अक्टूबर को हमलोग प्रधानमंत्री को ज्ञापन देने जा
रहे थे। हमारे साथ गायें भी थीं। करीब 150 महिलाएं थीं। रास्ते में अचानक रोका
गया और पुलिस ने लाठियां चलाईं। महिलाओं को भी पीटा गया। वह अमानवीय दृश्य था।
इस घटना से महीने भर पहले हमलोग अपनी अर्जी लेकर भारतीय जनता पार्टी के
कार्यालय गए थे। वहां भी किसी ने हमारी बात नहीं सुनी। जब हमलोगों ने नारे
लगाए तो पुलिस ने मुझे और मेरे 28 समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया। फिर
उल्टी-सीधी धाराएं लगा दी। मेरा मानना है कि गो रक्षा को लेकर जो लोग जन-जागरण
करने के लिए आगे आ रहे हैं, उन्हें एक रणनीति के तहत बदनाम करने की कोशिश हो
रही है। दरअसल, यही इतिहास है। आंदोलन करने वालों को सरकार पहले बदनाम करने की
कोशिश करती है, ताकि उसकी धार कमजोर पड़ जाए। फिर उसे दबा देती है। अभी वही हो
रहा है।



*गो रक्षा को लेकर देश में कई लोग सार्थक प्रयास कर रहे हैं। क्या आप उनके
संपर्क में हैं या फिर एकला चलो रे की नीति अपनाई है**?  *

सामूहिक प्रयास होंगे, तभी गो माता की रक्षा हो सकेगी। मेरा कोई हठ नहीं है।
26 नवंबर को आदरणीय गोविंदाचार्यजी मुझसे मिलने तिहाड़ जेल आए थे। उनसे बातचीत
कर मुझे शक्ति मिली है। गो माता की रक्षा के लिए देशभर में जो लोग सार्थक काम
कर रहे हैं, उन सभी को जोड़ने की बात गोविंदाचार्यजी ने कही है। मुझे उम्मीद
है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन तेजी से बढ़ेगा।



*क्या आपने अनशन तोड़ दिया है**? *

हां, 26 नवंबर को गोविंदाचार्यजी के हाथों से पेय पदार्थ ग्रहण कर मैंने अपना
व्रत तोड़ा है। दरअसल, उन्होंने जो बातें मुझसे कहीं, उससे मैं संतुष्ट हुआ और
यह जरूरी लगा कि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए अनशन समाप्त करना आवश्यक है।



*यह भी खबर आई थी कि आपकी तबीयत तेजी से बिगड़ रही है। इसमें कितनी सच्चाई है**?
*

दरअसल, चोट का असर बढ़ गया है। अब ये लोग अस्पताल ले जाते हैं, फिर जेल लाते
हैं। इससे तकलीफ बढ़ी है। हालांकि, जब हम बड़े उद्देश्य के लिए निकलते हैं तो
ये बातें अधिक महत्व नहीं रखती हैं। हां, दुख यह है कि जिनसे उम्मीद थी, उनके
स्वभाव में ही परिवर्तन आ गया है।
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